पारंपरिक भोजपुरी छठ लोकगीत (Traditional Chhath Geet Collection)
भोजपुरी, मैथिली और मगही लोक परंपरा में छठ गीतों का स्थान किसी भी अन्य उत्सव से सर्वोपरि है। ये केवल संगीत नहीं, बल्कि लोक जीवन की मौखिक परंपरा (Oral Folklore) हैं, जो सदियों से दादी-नानी से बेटियों और बहुओं तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंची हैं। बिना किसी आधुनिक वाद्ययंत्र, केवल ढोलक, झाल और मजीरे की मंद ताल पर गाए जाने वाले ये गीत प्रकृति, मातृत्व और सूर्य देव के प्रति अगाध प्रेम को दर्शाते हैं।
पारंपरिक छठ गीतों की अनोखी विशेषताएं
1. प्रकृति का सम्मान: गीतों में बांस के सूप, मिट्टी के दीये, अदरक के पौधे, केले के घौद और सुथनी का आदरपूर्वक उल्लेख मिलता है।
2. कठिन व्रत का मान: 'कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए' जैसे गीत बताते हैं कि व्रती किस प्रकार अत्यंत कोमलता और निष्ठा से पूजा का सामान घाट ले जाते हैं।
3. मातृत्व और आशीर्वाद: संतान की लंबी उम्र, कुल की खुशहाली और आरोग्य की कामना इन भजनों का मुख्य आधार है।
सदाबहार पारंपरिक गीतों का चयन
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पहिले पहिल छठी मईया (Pahile Pahil Chhathi Maiya) स्वर: शारदा सिन्हा – लोकगीतों का मुकुटमणि भजन
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उग हे सूरज देव (Ugg Ho Suraj Dev) स्वर: अनुराधा पौडवाल – पारंपरिक सूर्य वंदना
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जोड़े जोड़े फलवा सुरुज देव (Jode Jode Falwa Suruj Dev) स्वर: स्वाति मिश्रा – पारंपरिक मैथिली-भोजपुरी धुन
